विशेष रुप से प्रदर्शित

कब तक तुम मुझको रोकोगे

आप सबका कविकोष की पहली रचना देखने के लिए स्वागत है

कब तक तुम मुझको रोकोग

यह रचना उन असामाजिक तत्वों के लिए है जो आज भी रूडी वादी सोच को बढ़ावा दे रहे हैं अनुर कमज़ोर लोगो का शोषण कर रहे है

कब तक तुम मुझको रोकोगे . कब तक तुम मुझको रोकोगे

बर्बादी की अग्नि में कब तक तुम सपने झोकोगे

कब तक तुम मुझको रोकोगे . कब तक तुम मुझको रोकोगे||

 

लाचारी की उमस में खुशियों के बहते झोको को

देखेंगे कैसे रोकोगे

कब तक तुम मुझको रोकोगे . कब तक तुम मुझको रोकोगे||

 

अंत्योदय के जलज की मल में सौम्यता देख चौकोगे

कब तक तुम मुझको रोकोगे . कब तक तुम मुझको रोकोगे||

 

बेईमानी के पेड़ों को उठकर तुम अपने हाथों से

देखेंगे कैसे रोपोगे

कब तक तुम मुझको रोकोगे . कब तक तुम मुझको रोकोगे||

 

सच्चाई  के उजियारो को रोक पाखंड के अंधकारो को

देखेंगे कैसे सोपोगे

कब तक तुम मुझको रोकोगे . कब तक तुम मुझको रोकोगे||cropped-science-meets-poetry1

पैसठ का प्रतिकार (१९६५ भारत-पाक युद्ध )

यह कविता 1965 भारत पाक युद्ध की घटना का वर्णन करती है । जब पाक ने हमारे मृदु  रुख का फायदा उठाया और कश्मीर पर वार कर दिया हलाकि हम वह युद्ध जीत गए पर हमारे कई जवान शहीद हो गए ।

भूला नहीं है देश का एक भी कतरा वोह सवेरा
जिस रोज़ था तुमने हिन्द  की भूमि को घेरा
इस बार बनेगा तुम्हारा मुल्क नरसंघार
लेने वाला है हिन्द तुमसे पैसठ का अब प्रतिकार ॥

कश्मीर में घुस कर किया था
तुमने भारत के वफादारों पर वर
अब उनके प्रजनन लेंगे तुमसे
पैसठ का प्रतिकार ॥

मृदुता के बांधो से हो चूका है
जालसाज़ी का सलिल अब पर
लेने वाला है हिन्द तुमसे पैसठ
का अब प्रतिकार ॥

चाहे जो हो जाए
नहीं ठानेगा कोई रार
जब तक ले न ले तुमसे
पैसठं का अब प्रतिकार ॥

कानो में तुम्हारे दलालो के
गूंजेगी एक ही ललकार
खुद के कुकर्मो की रची
तान दी है अपने गले पर ही  तलवार
लेने वाला है हिन्द तुमसे पैसठ
का अब प्रतिकार ॥
-सार्थक बनर्जी

एकता में बल

सुना है हमने अदि काल
से आज हो या कल
एक ही मूल मंत्र जीवन का
एकता में बल ॥

जल हीन थल हीन जी लेता है जन जन
पर बिना साथ के शूरवीर भी जी ना पाया एक पल
एक ही मूल मंत्र जीवन का एकता में बल ॥

पक्षी क्षितिज का चोर ढूंढ़ने बना लेता है दल
असंभव को संभव करने का एक मात्रा है हल
एक ही मूल मंत्र जीवन का एकता में बल ॥
-सार्थक बनर्जी

हिन्द की आवाज़

मैं  हिन्द की आवाज़ हूँ

और आज बोल रहा हूँ

और आप सब के सामने

अपने मन के चाँद खोल रहा हूँ

मैं हिन्द की आवाज़ हूँ

इसलिए आज बूल रहा हूँ ॥

 

मैं मन में ही अपने अश्रु

घोल रहा हूँ

मैं हिन्द की आवाज़ हूँ

इसलिए आज बोल रहा हूँ ॥

 

मैं अपने और अपने मातहत

का अस्तित्व तोल रहा हूँ

मैं हिन्द की आवाज़ हूँ

और आज बोल रहा हूँ ॥

 

मैं खुद बखुद मुसीबत

मोल रहा हूँ

मैं हिन्द की आवाज़

हूँ और आज बोल रहा हूँ ॥

 

मैं अपने वजूद को

बचाने डोल रहा हूँ

मैं हिन्द की आवाज़ हूँ

और आज बोल रहा हूँ ॥

– सार्थक बनर्जी